रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में एक बार फिर खनन परियोजनाओं को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने अदाणी समूह से जुड़ी दो बड़ी कोयला परियोजनाओं के लिए करीब एक हजार हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग को सैद्धांतिक मंजूरी देने की सिफारिश की है।
इस फैसले के बाद जिले के जंगलों, पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के भविष्य को लेकर चिंता गहरा गई है।
जानकारी के मुताबिक, पहली परियोजना साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एसईसीएल) की पेलमा ओपनकास्ट कोयला खदान से जुड़ी है, जिसके संचालन की जिम्मेदारी अदाणी एंटरप्राइजेज की सहयोगी कंपनी पेलमा कोलियरीज को सौंपी गई है। इस परियोजना के लिए लगभग 360 हेक्टेयर वन भूमि के उपयोग का प्रस्ताव रखा गया है। वहीं दूसरी ओर, अदाणी समूह की कंपनी अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड के पुरुंगा भूमिगत कोयला ब्लॉक के लिए 620 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र मांगा गया है।
52 हजार से अधिक पेड़ों की कटाई की आशंका
वन सलाहकार समिति के समक्ष पेश दस्तावेजों के अनुसार, केवल पेलमा परियोजना के लिए ही 52 हजार से ज्यादा पेड़ों की कटाई की संभावना जताई गई है। तमनार क्षेत्र के ये जंगल न केवल जैव विविधता से समृद्ध हैं, बल्कि आसपास के गांवों के लिए जल, वन उत्पाद और आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियों से भूजल स्तर, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और पर्यावरणीय संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
पहले भी भड़का था विरोध
तमनार के गारे-पेलमा सेक्टर-2 कोयला परियोजना को लेकर पहले भी व्यापक विरोध देखने को मिला था। पिछले वर्ष मुड़ागांव और सरायटोला गांवों में हजारों पेड़ों की कटाई के दौरान ग्रामीणों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने जोरदार प्रदर्शन किया था।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि लगातार बढ़ती खनन परियोजनाओं के कारण उनकी जमीन, जंगल और पारंपरिक आजीविका खतरे में पड़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि खनन से क्षेत्र में प्रदूषण बढ़ेगा और विस्थापन की समस्या भी गंभीर हो सकती है। कई सामाजिक संगठनों ने ग्राम सभा की सहमति और पर्यावरणीय नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए हैं।
अभी अंतिम मंजूरी बाकी
हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार इन दोनों परियोजनाओं को फिलहाल केवल प्रथम चरण की सैद्धांतिक मंजूरी मिली है। अंतिम स्वीकृति से पहले संबंधित कंपनियों को प्रतिपूरक वनीकरण, पर्यावरण संरक्षण और अन्य कानूनी शर्तों का पालन करना होगा। सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद ही वन भूमि के अंतिम हस्तांतरण पर निर्णय लिया जाएगा।
विकास और पर्यावरण के बीच नई जंग
रायगढ़ में खनन परियोजनाओं के विस्तार ने एक बार फिर विकास बनाम पर्यावरण की बहस को तेज कर दिया है। एक तरफ सरकार और उद्योग जगत इन परियोजनाओं को रोजगार और औद्योगिक विकास के लिए जरूरी बता रहे हैं, तो दूसरी तरफ पर्यावरणविद और स्थानीय ग्रामीण जंगलों के लगातार सिकुड़ते दायरे और प्राकृतिक संसाधनों के नुकसान को लेकर चिंतित हैं।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले दिनों में प्रशासन, कंपनियां और स्थानीय समुदाय इस मुद्दे पर किस तरह का रास्ता निकालते हैं। फिलहाल इतना तय है कि रायगढ़ के जंगलों पर मंडरा रहा खनन का साया आने वाले समय में बड़ी बहस का केंद्र बनने वाला है।

