सक्ती, 27 जुलाई 2026।
हसौद थाना शनिवार शाम अपनी सामान्य गतिविधियों में व्यस्त था। ड्यूटी रजिस्टर में एंट्री हो रही थी, वायरलेस सेट पर संदेशों का आदान-प्रदान जारी था और पुलिसकर्मी गश्त की तैयारी में जुटे थे। तभी एक ऐसी खबर सामने आई जिसने पूरे पुलिस महकमे को स्तब्ध कर दिया।

हसौद थाने में पदस्थ आरक्षक जय कुमार लहरे ने थाने की ऊपरी मंजिल के एक कमरे में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। घटना की जानकारी मिलते ही साथी पुलिसकर्मी तत्काल मौके पर पहुंचे और उन्हें नीचे उतारकर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हसौद ले गए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टरों ने परीक्षण के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
आरक्षक की मौत की खबर मिलते ही परिवार में मातम छा गया। पत्नी, बच्चे और परिजन बदहवास हालत में अस्पताल पहुंचे। हर आंख नम थी और हर जुबान पर सिर्फ एक सवाल था—”आखिर ऐसा क्या हुआ कि उन्हें इतना बड़ा कदम उठाना पड़ा?”
फिलहाल परिजन किसी भी तरह की प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं हैं। पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है। आत्महत्या के पीछे की वास्तविक वजह का पता लगाने के लिए सभी पहलुओं की जांच की जा रही है।
क्या वर्दी के पीछे छिपा तनाव बन रहा है जानलेवा?
यह घटना सिर्फ एक पुलिसकर्मी की मौत नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था के भीतर मौजूद मानसिक दबाव की ओर भी गंभीर संकेत देती है। लंबी ड्यूटी, सीमित संसाधन, लगातार जिम्मेदारियां, जनता की अपेक्षाएं और निजी जीवन की चुनौतियां—इन सबके बीच कई पुलिसकर्मी मानसिक तनाव से जूझते हैं, लेकिन अक्सर उनकी पीड़ा सामने नहीं आ पाती।
वर्दी पहनने वाला हर व्यक्ति मजबूत दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर चल रही मानसिक लड़ाई कई बार किसी को दिखाई नहीं देती।
जांच के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी चर्चा
वरिष्ठ अधिकारियों ने मामले की निष्पक्ष जांच के निर्देश दिए हैं। साथ ही पुलिस विभाग में मानसिक स्वास्थ्य, तनाव प्रबंधन और नियमित काउंसलिंग जैसी व्यवस्थाओं को और प्रभावी बनाने की आवश्यकता पर भी चर्चा तेज हो गई है।
एक घटना, कई सवाल
जय कुमार लहरे की असमय मृत्यु केवल एक आंकड़ा नहीं है। यह एक परिवार की अपूरणीय क्षति है और साथ ही उस व्यवस्था के लिए भी एक गंभीर संदेश है, जिसमें दूसरों की सुरक्षा का जिम्मा उठाने वाले लोग स्वयं कई बार भीतर से टूटते चले जाते हैं।
इस घटना की वास्तविक वजह जांच के बाद ही स्पष्ट होगी। ऐसे मामलों में किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जांच का इंतजार करना आवश्यक है।

