रायगढ़, 27 जुलाई।
कहते हैं, “शराब घर नहीं उजाड़ती, लोग खुद उजाड़ लेते हैं।” लेकिन पूंजीपथरा थाना क्षेत्र के तराईमाल में यह कहावत एक भयावह सच बनकर सामने आई। यहां करोड़ों के सपनों वाला मुआवजे का पैसा आखिरकार एक लाश, एक हत्या और तीन आरोपियों की गिरफ्तारी पर जाकर खत्म हुआ।
जिस कमरे में पुलिस को पहली नजर में आत्महत्या का दृश्य दिखाई दिया, वहीं वैज्ञानिक जांच ने कहानी का दूसरा अध्याय खोल दिया। गले में साड़ी, कलाई पर ब्लेड का कट और तख्त पर पड़ा शव… सब कुछ ऐसा रचा गया था मानो मौत ने खुद दस्तक दी हो। लेकिन सच यह था कि मौत को बुलाया नहीं गया था, बल्कि बुलाकर मार दिया गया था।

पुलिस के अनुसार, मृतक गनपती लाल भगत (50) को गारे-पेलमा माइंस में जमीन अधिग्रहण के बदले 25-30 लाख रुपये मिले थे। उम्मीद थी कि यह रकम परिवार का भविष्य संवारेगी, लेकिन शराब की बोतलों ने भविष्य तो दूर, वर्तमान भी निगल लिया। आरोप है कि शराब की लत, घरेलू हिंसा और लगातार मुआवजे की रकम उड़ाने से तंग आकर पत्नी गंगाबाई और दो विधि से संघर्षरत अपचारी बालकों ने मिलकर उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी।
हत्या के बाद कहानी को आत्महत्या का रूप देने की कोशिश भी कम फिल्मी नहीं थी। ब्लेड से कलाई काटी गई, गले में कपड़ा बांधा गया और पुलिस को गुमराह करने की पूरी पटकथा तैयार की गई। लेकिन यह पटकथा ज्यादा देर नहीं चली।
पूंजीपथरा पुलिस ने महज 48 घंटे में पूरे मामले की परतें उधेड़ दीं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट, घटनास्थल की बारीकी से जांच और लगातार पूछताछ ने उस झूठ को बेनकाब कर दिया, जो आत्महत्या के नाम पर छिपाने की कोशिश की जा रही थी।
इस मामले में पत्नी गंगाबाई भगत और दो विधि से संघर्षरत अपचारी बालकों को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 103(1), 238 एवं 3(5) के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—जब जमीन का मुआवजा परिवार की खुशहाली की जगह शराब की भेंट चढ़ जाए, तो आखिर जीत किसकी होती है?
शराब की… या बर्बादी की?
वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शशि मोहन सिंह के निर्देशन तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनिल सोनी, डीएसपी सुशांतो बनर्जी के मार्गदर्शन में थाना प्रभारी रामकिंकर यादव और उनकी टीम ने जिस तेजी और वैज्ञानिक तरीके से इस अंधे कत्ल का खुलासा किया, उसने यह साफ कर दिया कि अपराध कितना भी चालाक क्यों न हो, सच्चाई देर-सबेर सामने आ ही जाती है।
व्यंग्य की बात बस इतनी है—
जिस मुआवजे से परिवार का घर बनना था, उसी पैसे ने पहले शराब खरीदी, फिर झगड़े खरीदे और आखिर में एक चिता खरीद ली।

