ढाई साल से जिला पंचायत में जमे अतिरिक्त सीईओ, शासन के आदेशों पर उठे गंभीर सवाल
रायगढ़। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। जिला पंचायत रायगढ़ में पदस्थ अतिरिक्त मुख्य कार्यपालन अधिकारी (अतिरिक्त सीईओ) नीलाराम पटेल का मार्च 2024 में स्थानांतरण होने के बावजूद करीब ढाई वर्ष बाद भी कार्यमुक्त नहीं किया जाना शासन के आदेशों की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस दौरान शासन स्तर से एक-दो नहीं, बल्कि छह अलग-अलग आदेश, निर्देश और पत्राचार जारी किए गए, यहां तक कि कारण बताओ नोटिस भी जारी हुआ, लेकिन इसके बावजूद आज तक अधिकारी रायगढ़ जिला पंचायत में ही पदस्थ हैं।
मार्च 2024 में हुआ था स्थानांतरण
मिली जानकारी और उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, 12 मार्च 2024 को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मंत्रालय द्वारा नीलाराम पटेल का स्थानांतरण जिला पंचायत रायगढ़ से जिला पंचायत बीजापुर कर दिया गया था। सामान्य परिस्थितियों में स्थानांतरण आदेश जारी होने के बाद अधिकारी को निर्धारित समय में कार्यमुक्त होकर नई पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण करना होता है, लेकिन इस मामले में ऐसा नहीं हुआ।
आदेश पर आदेश, फिर भी नहीं हुआ पालन
बताया जाता है कि जब स्थानांतरण आदेश का पालन नहीं हुआ तो शासन ने लगातार कार्रवाई की।
- 12 मार्च 2024 – स्थानांतरण आदेश जारी।
- 29 अक्टूबर 2024 – तत्काल कार्यभार मुक्त करने का निर्देश।
- 27 नवंबर 2024 – रिमाइंडर जारी।
- 20 जनवरी 2025 – विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा एकतरफा नवीन पदस्थापना स्थल पर ज्वाइनिंग के निर्देश।
- 18 सितंबर 2025 – आदेशों की अवहेलना पर कारण बताओ नोटिस जारी।
- 26 नवंबर 2025 – पुनः पत्राचार कर आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश।
इन सभी आदेशों के बावजूद अधिकारी का कार्यमुक्त नहीं होना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
वेतन रोकने के निर्देश का भी पालन नहीं?
सूत्रों के अनुसार, जनवरी 2026 में सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा एक आदेश जारी किया गया था, जिसमें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि स्थानांतरण के बाद भी मूल पद पर जमे अधिकारियों का वेतन आहरित नहीं किया जाए। बताया जा रहा है कि इस मामले में इस निर्देश का भी पालन नहीं किया गया और संबंधित अधिकारी का वेतन पूर्ववत जारी रहा। यदि यह तथ्य सही है तो यह केवल स्थानांतरण आदेश की अवहेलना नहीं, बल्कि शासन के वित्तीय एवं प्रशासनिक निर्देशों की भी अनदेखी माना जाएगा।
2014 से लगभग पूरा कार्यकाल रायगढ़ जिले में
इस पूरे मामले का एक और पहलू भी चर्चा में है। जानकारी के अनुसार, वर्ष 2014 में सेवा में आने के बाद से नीलाराम पटेल का अधिकांश कार्यकाल रायगढ़ जिले में ही बीता है। केवल लगभग एक वर्ष के लिए वे रायगढ़ जिले से लगे डभरा क्षेत्र में जनपद पंचायत सीईओ रहे, जबकि शेष अवधि रायगढ़ जिले के विभिन्न पदों पर ही बिताई।
बताया जाता है कि वे पुसौर, बरमकेला सहित विभिन्न स्थानों पर पदस्थ रहने के बाद पिछले तीन वर्ष से अधिक समय से उप संचालक पंचायत एवं अतिरिक्त सीईओ जिला पंचायत रायगढ़ के रूप में कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, वे रायगढ़ विकासखंड के एक ग्राम पंचायत के मूल निवासी भी बताए जाते हैं।
स्थानीय अधिकारी से कराए गए बड़े चुनाव
सूत्रों का कहना है कि स्थानीय निवासी होने के बावजूद उन्हें जिले के महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद पर बनाए रखा गया और उनके कार्यकाल में विधानसभा चुनाव, लोकसभा चुनाव तथा पंचायत चुनाव जैसे महत्वपूर्ण निर्वाचन कार्य भी संपन्न कराए गए। इसे लेकर भी प्रशासनिक निष्पक्षता और स्थानांतरण नीति के पालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका भी सवालों में
जानकारी के अनुसार, स्थानांतरण आदेश जारी होने के बाद तत्कालीन जिला पंचायत सीईओ द्वारा उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया गया। आरोप है कि बाद में पदस्थ हुए अधिकारियों ने भी इसी स्थिति को बनाए रखा, जिसके कारण शासन के लगातार आदेश केवल फाइलों तक सीमित रह गए।
प्रशासनिक अनुशासन पर बड़ा सवाल
इस पूरे मामले ने शासन की कार्यप्रणाली पर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यदि किसी सामान्य कर्मचारी द्वारा स्थानांतरण आदेश का पालन नहीं किया जाता, तो उसके विरुद्ध तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है। लेकिन यहां मंत्रालय, विकास आयुक्त कार्यालय और सामान्य प्रशासन विभाग के लगातार आदेशों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर रहा है।
चर्चा यह भी है कि क्या किसी प्रभावशाली राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के कारण यह स्थिति बनी हुई है? हालांकि इस संबंध में किसी भी प्रकार की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
अब शासन की कार्रवाई पर निगाहें
अब सबकी निगाहें राज्य शासन पर टिकी हैं। यह देखना होगा कि इतने आदेशों की अवहेलना के बाद जिम्मेदारी तय होती है या फिर यह मामला भी अन्य फाइलों की तरह सरकारी रिकॉर्ड में दबकर रह जाएगा।
क्या कहते हैं अधिकारी?
“इस संबंध में आदेश तो जारी किया गया था। इसके बाद किस वजह से ट्रांसफर की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी, यह देखना होगा। विधानसभा सत्र समाप्त होने के बाद इस मामले में उचित कार्रवाई की जाएगी।”
— वी.पी. तिर्की, अपर विकास आयुक्त, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, रायपुर
“उनका ट्रांसफर तो हुआ था, लेकिन अभी इस मामले में क्या स्थिति है, इसकी मुझे जानकारी नहीं है। यह मामला मेरे कार्यभार ग्रहण करने से पहले का है, इसलिए रिकॉर्ड देखकर ही कुछ कहा जा सकता है।”
— अभिजीत पठारे, मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत रायगढ़
मंत्री ओपी चौधरी पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद छत्तीसगढ़ के वित्त एवं वाणिज्यिक कर मंत्री ओपी चौधरी, जिनका राजनीतिक कार्यक्षेत्र रायगढ़ है, उनकी भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। सवाल यह उठ रहे हैं कि जब स्थानांतरण के बाद भी एक अधिकारी करीब ढाई वर्ष तक उसी जिले में बना रहा और शासन स्तर से लगातार आदेश जारी होते रहे, तब जिले के जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार लोगों ने इस मामले का संज्ञान क्यों नहीं लिया।
विपक्ष और स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि यदि शासन के आदेशों का पालन नहीं हो रहा था, तो संबंधित विभाग और जिले के जनप्रतिनिधियों ने इसे लागू कराने के लिए क्या पहल की। हालांकि, अब तक मंत्री ओपी चौधरी की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
अब यह देखना होगा कि शासन और संबंधित विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं और क्या लंबे समय से लंबित स्थानांतरण आदेशों के पालन की जिम्मेदारी तय की जाती है।

