घरघोड़ा/रायगढ़।
प्रस्तावित पोरडा–चिमटापानी कोल परियोजना को लेकर प्रभावित गांवों में विरोध की शुरुआत हो गई है। पोरडा, कठरापाली, कांटाझरिया, सिंघनपुर, कोनपारा और चिमटापानी के ग्रामीणों ने युवा कांग्रेस ग्रामीण जिला अध्यक्ष रायगढ़ एवं पूर्व नगर पंचायत उपाध्यक्ष उस्मान बेग के नेतृत्व में SDM और तहसीलदार घरघोड़ा को विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए स्पष्ट चेतावनी दी कि जब तक मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार और ग्रामसभा की सहमति पर लिखित निर्णय नहीं होगा, तब तक SECL का कोई सर्वे नहीं होने दिया जाएगा।

ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 2025 में पोरडा गांव में सर्वे किया गया, लेकिन आज तक परियोजना की वास्तविक स्थिति, प्रभावित परिवारों की सूची, मुआवजा नीति और पुनर्वास योजना सार्वजनिक नहीं की गई। ऐसे में अन्य गांवों में सर्वे शुरू करना ग्रामीणों के साथ अन्याय होगा।

ग्रामीणों की प्रमुख मांगें
भूमि सर्वे से पहले सभी किसानों को बंटांकन एवं राजस्व अभिलेख दुरुस्त कराने का अवसर मिले।
वर्तमान बाजार मूल्य के अनुसार कम से कम चार गुना मुआवजा दिया जाए।

प्रत्येक प्रभावित परिवार के एक सदस्य को स्थायी रोजगार मिले तथा आउटसोर्सिंग में 70 प्रतिशत स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता दी जाए।
पुनर्वास स्थल पर पक्का मकान, सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, आंगनवाड़ी और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
वनाधिकार दावों के निराकरण से पहले किसी भी प्रकार का भूमि अधिग्रहण या सर्वे न किया जाए।
ग्रामसभा की लिखित सहमति और एमओयू के बिना परियोजना की कोई प्रक्रिया आगे न बढ़ाई जाए।
उस्मान बेग ने कहा कि “हम विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन विकास के नाम पर ग्रामीणों के संवैधानिक अधिकारों का हनन स्वीकार नहीं किया जाएगा। पहले अधिकारों की गारंटी, फिर परियोजना की प्रक्रिया।”
उन्होंने यह भी कहा कि यह ज्ञापन केवल आवेदन नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की लड़ाई की पहली संगठित दस्तक है। यदि प्रशासन और SECL ने मांगों पर गंभीरता नहीं दिखाई तो यह आंदोलन आगे व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
ज्ञापन की प्रतिलिपि कलेक्टर रायगढ़, SECL प्रबंधन, पुलिस अधीक्षक, तहसीलदार, क्षेत्रीय महाप्रबंधक एवं थाना प्रभारी को भी भेजी गई है।
असरदार सवाल
क्या प्रशासन पहले ग्रामीणों का भरोसा जीतेगा या बिना सहमति के सर्वे की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी?
अब पूरे क्षेत्र की निगाहें प्रशासन और SECL के अगले फैसले पर टिकी हैं। पोरडा–चिमटापानी परियोजना की राह अब केवल सरकारी प्रक्रिया से नहीं, बल्कि प्रभावित ग्रामीणों के विश्वास और सहमति से तय होगी।

