रायगढ़। जिले की सरकारी शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और बच्चों को बेहतर भविष्य देने के तमाम दावों के बीच रायगढ़ जिले के 103 प्राथमिक विद्यालय और 23 मिडिल स्कूल आज भी केवल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
ऐसे में हजारों विद्यार्थियों की पढ़ाई-लिखाई और उनके सर्वांगीण विकास पर प्रतिकूल असर पड़ना तय माना जा रहा है।
ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों में स्थित इन स्कूलों में एक शिक्षक को एक साथ कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं। बच्चों को अलग-अलग कक्षाओं का पाठ पढ़ाने के साथ-साथ शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन, मध्याह्न भोजन की निगरानी, प्रशासनिक कार्यों और विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों की जिम्मेदारी भी उन्हीं के कंधों पर है।
परिणामस्वरूप शिक्षण कार्य प्रभावित हो रहा है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एक ही शिक्षक के लिए सभी कक्षाओं को समान रूप से समय देना संभव नहीं है।
इसका सीधा असर बच्चों की बुनियादी शिक्षा, सीखने की क्षमता और परीक्षा परिणामों पर पड़ रहा है। विशेष रूप से प्राथमिक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए पर्याप्त संख्या में शिक्षकों की नियुक्ति बेहद जरूरी है।
ग्रामीण क्षेत्रों के अभिभावकों ने भी लंबे समय से स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि सरकार शिक्षा सुधार के बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है।
कई स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि शिक्षकों की नियुक्ति उसी अनुपात में नहीं हो पा रही है।
शिक्षा विभाग के आंकड़े यह साफ संकेत दे रहे हैं कि जिले में शिक्षकों की कमी अब गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और सरकार इस चुनौती से निपटने के लिए क्या कदम उठाते हैं।
शिक्षा के मंदिरों में शिक्षकों की यह कमी केवल आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि हजारों बच्चों के भविष्य से जुड़ा सवाल है। यदि समय रहते इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ सकता है।

