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सावित्रीबाई फुले के विचारों में निहित है भारतीय संविधान की आत्मा, समानता शिक्षा और सामाजिक न्याय की वैचारिक अग्रदूत थीं सावित्रीबाई फुले

Basant Ratre
Last updated: January 3, 2026 7:14 am
Basant Ratre 31 Views
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4 Min Read
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👉: आलेख- सुनील भारद्वाज (संस्थापक सदस्य, भारतीय संविधान प्रचारिणी सभा, भारत

भारत का सामाजिक इतिहास असमानता, भेदभाव और बहिष्करण के विरुद्ध संघर्षों से भरा रहा है। विशेष रूप से स्त्रियाँ, दलित और शूद्र वर्ग लंबे समय तक शिक्षा, सम्मान और अधिकारों से वंचित रहे।

ऐसे दौर में सामाजिक चेतना की मशाल जलाने वाली महान विचारकों में सावित्रीबाई फुले का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है। वे न केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं, बल्कि नारी मुक्ति, सामाजिक समानता और मानव गरिमा की सशक्त प्रवक्ता भी थीं
।
3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के नायगांव में जन्मी सावित्रीबाई फुले ने उस समय शिक्षा का दीप जलाया, जब स्त्रियों का पढ़ना सामाजिक अपराध माना जाता था। अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ उन्होंने 1848 में भारत का पहला बालिका विद्यालय खोलकर सामाजिक क्रांति की नींव रखी।

उन्होंने शूद्र-अतिशूद्र, दलित और वंचित वर्गों के लिए शिक्षा के द्वार खोले तथा विधवा विवाह, बाल विवाह निषेध, सती प्रथा और छुआछूत जैसी कुप्रथाओं का खुलकर विरोध किया।

शिक्षा को मुक्ति का मार्ग बताया
सावित्रीबाई फुले का मानना था कि शिक्षा ही शोषण से मुक्ति का सबसे सशक्त साधन है।

उनका प्रसिद्ध कथन—
“शिक्षा बिन मति गई, मति बिन नीति गई…”
आज भी सामाजिक चेतना का मूल मंत्र है। यही विचार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A में शिक्षा के अधिकार के रूप में साकार हुआ, जिसमें 6 से 14 वर्ष तक के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है।

नारी समानता की प्रणेता
सावित्रीबाई फुले ने स्त्रियों को स्वतंत्र और समान नागरिक के रूप में देखने की वकालत की।

उन्होंने पितृसत्तात्मक सोच और स्त्री शोषण का विरोध किया। संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1) और 15(3) में नारी समानता और महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान उनके विचारों की स्पष्ट संवैधानिक अभिव्यक्ति हैं।

जाति उन्मूलन और सामाजिक न्याय
जाति व्यवस्था को अमानवीय और शोषणकारी बताते हुए सावित्रीबाई फुले ने अस्पृश्यता और भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष किया। संविधान का अनुच्छेद 17, जो अस्पृश्यता को पूर्णतः समाप्त करता है, उनके सामाजिक आंदोलन की ऐतिहासिक विजय माना जाता है।

मानव गरिमा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण
विधवाओं के लिए आश्रय गृह, विधवा पुनर्विवाह का समर्थन और नवजात शिशुओं की रक्षा जैसे कार्य सावित्रीबाई फुले के मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाते हैं।

यह विचार अनुच्छेद 21 (सम्मानपूर्वक जीवन का अधिकार) में प्रतिबिंबित होता है।

वहीं अंधविश्वास और पाखंड के विरोध में उनका तर्कशील चिंतन संविधान के अनुच्छेद 51A(h) में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मूल कर्तव्य के रूप में दिखाई देता है।
संविधान और सावित्रीबाई फुले : वैचारिक निरंतरता
सावित्रीबाई फुले और डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों में गहरी समानता दिखाई देती है।

शिक्षा, समानता, जाति उन्मूलन, मानव गरिमा और वैज्ञानिक सोच— ये सभी मूल्य भारतीय संविधान की आधारशिला हैं, जिनकी वैचारिक नींव सावित्रीबाई फुले ने 19वीं सदी में रखी थी।

निष्कर्ष
सावित्रीबाई फुले केवल समाज सुधारक नहीं, बल्कि संवैधानिक चेतना की अग्रदूत थीं। उन्होंने जिन मूल्यों के लिए संघर्ष किया, वही मूल्य 1950 में भारतीय संविधान के रूप में स्थापित हुए।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भारतीय संविधान की आत्मा में सावित्रीबाई फुले के संघर्षों की धड़कन आज भी सुनाई देती है।

आज जब देश शिक्षा, नारी अधिकार और सामाजिक न्याय की बात करता है, तो वह अनजाने में ही सावित्रीबाई फुले के विचारों को जी रहा होता है।

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