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होम्योपैथी की जन्मस्थली जर्मनी में छत्तीसगढ़ के होम्योपैथ चिकित्सक डॉ उत्कर्ष त्रिवेदी की गूंज

Basant Ratre
Last updated: April 28, 2025 11:31 am
Basant Ratre 121 Views
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7 Min Read
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होम्योपैथी डॉक्टरों के लिए सपनों का देश जर्मनी में शुक्रवार 11 अप्रैल को डॉ. सैमुअल हैनिमैन के 270वें जन्मदिवस के अवसर पर ग्लोबल होम्योपैथिक समिट 3 का आयोजन जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में किया गया, जिसमें दुनिया के 25 से अधिक देशों के होम्योपैथ महारथी, महात्मा हैनिमेन के जन्मदिवस के अवसर पर उनके जन्मस्थली कोथेन, जर्मनी मे एक ही छत के निचे भारतीय होमीयोपैथि के स्वर्णिम काल का संखनाद हुवा जिसमे रायपुर छत्तीसगढ़ के डॉ उत्कर्ष त्रिवेदी को सम्मानित किया गया.यह सम्मान रायपुर के लिए ही नहीं बल्कि पुरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का विषय है.वही भारतीय चिकित्सकों ने दुनिया को एक संदेश दे दिया की होमीयोपैथी भारत का अध्यात्म है और जर्मनी का विज्ञान है, भारत इस चिकित्सा पद्धति का न सिर्फ ध्वजा वाहक है बल्कि यह विश्व स्वास्थ्य मे यहदान देने मे अग्रणी भी है और ये भी एक सच्चाई है भारत ही यूरोप और विश्व को इस चिकित्सा पद्धति का वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण प्रदान करने की क्षमता रखता है होम्योपैथी के जन्मदाता डॉ. हैनिमैन के जन्मस्थान जर्मनी में मंच की छटा के बीच भारतीय होम्योपैथ चिकित्सकों ने अपने जिले व देश का मान बढ़ाया। सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ से एकमात्र होमियोपैथिक चिकित्सक ले रूप मे रायपुर जिले के डॉ उत्कर्ष त्रिवेदी को इस समिट के लिए चयनित किया गया। यह चयन होम्योपैथी में उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए किया गया।

शोध और नवाचारों के लिए कई हुवे सम्मानित

डॉ. त्रिवेदी ने होम्योपैथी को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ जोड़ने का प्रयास किया है, जिससे अनेक जटिल रोगों का प्रभावी उपचार संभव हुआ है। उनकी चिकित्सा पद्धति न केवल भारत बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सराही जा रही है। उनके शोध कार्य और उपचार विधियों ने हजारों मरीजों को लाभान्वित किया है, जिससे वे इस क्षेत्र में एक प्रेरणास्रोत बन गए हैं।कार्यक्रम में भारतीय होम्योपैथिक चिकित्सकों ने जर्मनी के डॉक्टरों को भारतीय होम्योपैथिक दृष्टिकोण से अवगत कराया और बताया कि भारत अब चिकित्सा के इस पद्धति में किसी से पीछे नहीं है।

भारत में इस पद्धति को न सिर्फ जनस्वास्थ्य बल्कि जनसेवा के रूप में अपनाया जा रहा है।इस कार्यक्रम मे इंग्लैंड क्रिकेट विश्व कप विजेता टीम के कप्तान एॉइन मॉर्गन, नेटफ्लिक्स पे होमीयोपैथी के जादुई असर पर आने वाली डॉक्यूमेंट्री के सभी चिकित्सक, यु एस ए से डॉ लौरी, ब्राजील से डॉ डोली, यूनाइटेड किंगडम से डॉ मुरै, भारत से प्रमुख रूप से डॉ नितीश चंद्र दुबे, richa दुबे आदि देश विदेश से चिकित्सक उपस्थित थे.डॉ.उत्कर्ष त्रिवेदी की माने तो इस मंच पर भारत के साथ-साथ रायपुर छत्तीसगढ़ का नाम भी रोशन हुआ। उन्होंने यह सफलता अपने माता पिता,जिले व देश के सभी मरीजों को समर्पित की जो संतुष्ट होकर इलाज के बाद पूरी तरह से ठीक हों जाते हैउनका यह सम्मान होम्योपैथी चिकित्सा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने में सहायक होगा।

उनके कोरोना कॉल के समय में सेवा , समर्पण और निष्ठा से प्रेरित होकर आने वाली पीढ़ियां भी होम्योपैथी के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करेगी .10 अप्रैल को जर्मनी के ऐतिहासिक नगर कोथेन स्थित हैनिमेन हाउस में होम्योपैथी के जनक डॉ. सैमुएल हैनिमैन की जयंती के उपलक्ष्य में एक भव्य एवं ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ। यह स्थान, जहाँ कभी डॉ. हैनिमैन स्वयं रहते थे और अपनी चिकित्सा पद्धति को आकार देते थे, आज भी होम्योपैथी प्रेमियों के लिए तीर्थस्थल से कम नहीं है।इस अवसर पर भारत सहित विश्व के कई देशों से आए होम्योपैथिक चिकित्सकों, शोधकर्ताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह किसी भी होम्योपैथिक चिकित्सक के लिए एक सपना सच होने जैसा अनुभव रहा — अपने चिकित्सा पथ के जनक को उनके निवास स्थान पर श्रद्धांजलि अर्पित करना, और उस भूमि को नमन करना जहाँ से होम्योपैथी की लौ प्रज्ज्वलित हुई।

अंतरराष्ट्रीय संवाद और अनुभवों का संगमइस आयोजन का एक विशेष पक्ष यह रहा कि इसमें विश्व के विभिन्न देशों से आए विशेषज्ञों एवं चिकित्सकों से मिलने और संवाद करने का सुनहरा अवसर मिला।इन संवादों से विभिन्न देशों में होम्योपैथी की स्थिति, अनुसंधान की दिशा, तथा नई तकनीकों और उपचार पद्धतियों की जानकारी प्राप्त हुई। यह अनुभव अत्यंत ज्ञानवर्धक और दृष्टिकोण-विस्तारक रहा, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि होम्योपैथी एक वैश्विक आंदोलन बन चुका है।जर्मनी एवं स्विट्ज़रलैंड की अनुशासित जीवनशैली से प्रेरणाइस यात्रा का दूसरा अत्यंत प्रेरणादायक पक्ष रहा — जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड की सामाजिक व्यवस्था और नागरिकों का अनुशासन।इन देशों में जीवन का हर पहलू — चाहे वह सार्वजनिक परिवहन हो, यातायात व्यवस्था हो, स्वच्छता, समय पालन या पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी — अत्यंत सुनियोजित और अनुशासित है।समय की पाबंदी: ट्रेनों, बसों और अन्य सेवाओं का समय इतना सटीक होता है कि नागरिकों का जीवन एक लय में चलता है।

सार्वजनिक स्वच्छता: सड़कों, रेलवे स्टेशनों, पार्कों और अन्य स्थानों पर स्वच्छता का उच्चतम स्तर देखा गया, जो वहाँ के नागरिकों की जागरूकता और जिम्मेदारी का परिचायक है।नियमों का पालन: यातायात संकेतों का आदर, पैदल यात्रियों की प्राथमिकता, और कानून के प्रति सम्मान — यह सब अनुकरणीय है।सामाजिक सहयोग: नागरिकों में सामाजिक दायित्व का गहरा बोध है, जिससे वहाँ का वातावरण शांत, सुरक्षित और सुसंस्कृत बनता है।यह सब भारतीय संदर्भ में प्रेरणास्पद है — यदि हम भी इसी तरह अनुशासन, समयपालन और सामाजिक जिम्मेदारी को अपनाएँ, तो हमारे देश में भी अभूतपूर्व सकारात्मक परिवर्तन संभव है।यह यात्रा केवल एक चिकित्सा सम्मेलन की भागीदारी नहीं रही, बल्कि यह एक आध्यात्मिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक यात्रा रही।

यह अनुभव न केवल एक चिकित्सक के रूप में हमारे ज्ञान को समृद्ध करता है, बल्कि एक नागरिक और वैश्विक मानव के रूप में भी हमें गहराई से प्रभावित करता है।यह आयोजन एक संदेश देता है — कि जब चिकित्सा, अनुशासन और वैश्विक संवाद एक साथ आते हैं, तो केवल व्यक्ति नहीं, समाज और सभ्यताएँ भी समृद्ध होती हैं।

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