
घरघोड़ा-लैलूंगा मार्ग पर रोज सुबह और दोपहर के समय एक भावुक दृश्य देखने को मिलता है। सड़क किनारे कुछ ग्रामीण महिलाएं अपने परिवार के भरण-पोषण की आशा में जंगल से लाए गए उत्पाद जैसे मशरूम, तेंदू, चना और फल्ली बेचते हुए नज़र आती हैं। इनके पास कोई दुकान नहीं, न छांव की सुविधा, फिर भी ये महिलाएं धूप, बारिश और थकान की परवाह किए बिना मेहनत और आत्मसम्मान के साथ जीवन यापन का प्रयास कर रही हैं।

ये महिलाएं न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर रही हैं, बल्कि जैविक और प्राकृतिक उत्पादों को शहर तक पहुँचाकर एक स्वस्थ समाज की भी नींव रख रही हैं। इनकी मेहनत में आत्मनिर्भर भारत की परछाईं साफ नज़र आती है।

लेकिन इनका यह संघर्ष शासन-प्रशासन के लिए एक सवाल बनकर खड़ा होता है — क्या इन महिलाओं के लिए कोई स्थायी सुविधा नहीं होनी चाहिए?.
इनके लिए यदि सड़क किनारे एक सुरक्षित हाट बाजार, छायादार जगह, पेयजल व्यवस्था, या छोटे स्टॉल की सुविधा दी जाए, तो ये महिलाएं आत्मनिर्भरता के साथ अपने बच्चों का भविष्य भी संवार सकती हैं।
आज जब सरकार महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की बात कर रही है, तब ऐसे वास्तविक संघर्षशील चेहरों की ओर ध्यान देना नितांत आवश्यक हो जाता है।
यह केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि विकास के उस छोर की झलक है, जहां उम्मीदें अब भी ज़िंदा हैं — बस ज़रूरत है एक संवेदनशील दृष्टिकोण की।
✍️ विशेष संपादकीय ब्यूरो रिपोर्ट | रायगढ़

