समाज में अक्सर यह कहा जाता है – “नशा शराब में होती तो नाचती बोतल।” यह पंक्ति सुनने में भले ही व्यंग्यात्मक लगे, लेकिन इसके भीतर एक गहरी सच्चाई छिपी है। नशा किसी बोतल, गिलास या पदार्थ में नहीं होता, बल्कि इंसान की सोच, आदत और कमजोर इच्छाशक्ति में होता है।
आज गांव से लेकर शहर तक शराब और अन्य नशे की बढ़ती प्रवृत्ति एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है।
सड़क दुर्घटनाएं, घरेलू हिंसा, पारिवारिक कलह, आर्थिक बर्बादी और अपराध—इन सभी की जड़ में कहीं न कहीं नशे की लत दिखाई देती है।
विडंबना यह है कि लोग अपनी गलतियों का दोष शराब पर डाल देते हैं, जबकि असली जिम्मेदारी उनकी खुद की होती है।
शराब की बोतल खुद चलकर किसी के घर नहीं जाती, न ही किसी को जबरदस्ती पीने पर मजबूर करती है। फैसला इंसान खुद करता है। एक बार की आदत धीरे-धीरे लत बन जाती है और फिर यही लत परिवार और समाज दोनों को खोखला कर देती है।
कई घरों में बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, महिलाओं को प्रताड़ना झेलनी पड़ती है और कमाई का बड़ा हिस्सा नशे में बर्बाद हो जाता है।
सरकारें नशामुक्ति अभियान चलाती हैं, पुलिस कार्रवाई करती है, जागरूकता कार्यक्रम होते हैं, लेकिन जब तक व्यक्ति खुद ठान न ले, बदलाव संभव नहीं है।
असली लड़ाई शराब से ज्यादा मानसिकता से है। हमें यह समझना होगा कि नशा किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं की शुरुआत है।
समाज के जागरूक नागरिकों, युवाओं और परिवारों को मिलकर नशामुक्ति की दिशा में कदम बढ़़ज़ोरी से उठाने होंगे। खेल, शिक्षा, रोजगार और सकारात्मक गतिविधियों की ओर युवाओं को प्रेरित करना होगा।
तभी एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज की कल्पना साकार हो सकेगी।
अंत में यही कहना उचित होगा—दोष बोतल का नहीं, फैसला इंसान का होता है।अगर सोच बदल जाए, तो हर घर नशामुक्त और खुशहाल बन सकता है।
