Basant Ratre छत्तीसगढ़ विशेष –



रायपुर। छत्तीसगढ़ में शराब को लेकर बहस नई नहीं है। एक तरफ सरकार के लिए शराब आबकारी राजस्व का बड़ा स्रोत है, दूसरी तरफ शराब के कारण परिवारों में आर्थिक संकट, घरेलू कलह, स्वास्थ्य समस्याएं और सामाजिक अपराध की शिकायतें सामने आती रहती हैं। ऐसे में सवाल सीधा है—छत्तीसगढ़ में शराबबंदी होनी चाहिए या नहीं?
सरकार कह सकती है—शराब बिक रही है तो राजस्व आ रहा है।
समाज पूछ सकता है—लेकिन घर में पैसा बच रहा है क्या?
यही वह सवाल है, जिस पर अब गंभीर बहस की जरूरत है।
शराब की दुकान सरकारी, नुकसान किसका?
छत्तीसगढ़ में शराब की बिक्री राज्य की नियंत्रित व्यवस्था के तहत होती है। आबकारी विभाग 2026-27 के लिए भी देशी शराब की आपूर्ति संबंधी व्यवस्था चला रहा है।
यानी व्यवस्था कानूनी है, बोतल पर टैक्स है और सरकार के खाते में राजस्व भी।
लेकिन शराब की बोतल घर पहुंचने के बाद कहानी सरकारी फाइल से निकलकर परिवार की रसोई तक पहुंच जाती है।
कहीं महीने की कमाई का हिस्सा शराब में चला जाता है, कहीं नशे में विवाद होता है, कहीं घरेलू हिंसा की नौबत आती है तो कहीं बीमारी और दुर्घटना का खर्च परिवार की कमर तोड़ देता है।
सरकार को बोतल पर टैक्स मिलता है, लेकिन परिवार को कई बार उसकी कीमत ब्याज समेत चुकानी पड़ती है।
शराबबंदी के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क—परिवार बचे
शराबबंदी के समर्थकों का कहना है कि शराब की उपलब्धता सीमित होने से शराब सेवन और उससे जुड़े नुकसान को कम किया जा सकता है।
खासकर गरीब और निम्न आय वाले परिवारों में शराब पर होने वाला खर्च बच्चों की पढ़ाई, भोजन, कपड़े और घर की जरूरतों से पैसा काट सकता है।
अगर वही पैसा घर में रहे तो बच्चों की फीस भरेगी, राशन आएगा, इलाज होगा और शायद घर की छत भी समय पर बन जाएगी।
बोतल खाली होने के बाद पैसा वापस नहीं आता, लेकिन परिवार की जरूरतें हर महीने वापस जरूर आती हैं।
महिलाओं के लिए शराबबंदी कितनी राहत?
शराब और घरेलू हिंसा के बीच संबंध को लेकर कई अध्ययनों में चिंता सामने आई है। शराब सेवन हिंसा का एकमात्र कारण नहीं है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यह हिंसा का जोखिम बढ़ा सकता है।
इसलिए शराब की उपलब्धता घटाने के साथ महिलाओं की सुरक्षा और परिवार पर होने वाले प्रभाव को गंभीरता से देखना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में कुछ गांवों ने सरकारी आदेश का इंतजार किए बिना सामुदायिक स्तर पर शराबबंदी की पहल भी की है। खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के खपरी दरबार गांव में ग्रामीणों ने शराब बिक्री के खिलाफ अपनी निगरानी व्यवस्था बनाई थी।
यानी गांव कह रहा है—“पहले हमारा घर बचाओ, फिर राजस्व का हिसाब करना।”
लेकिन पूर्ण शराबबंदी का दूसरा चेहरा भी है
अब सवाल का दूसरा पहलू भी उतना ही जरूरी है।
अगर शराब पूरी तरह बंद कर दी गई और मांग खत्म नहीं हुई, तो अवैध शराब का कारोबार बढ़ने का खतरा रहता है। तस्करी, नकली शराब और जहरीली शराब जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।
यानी दुकान का शटर बंद हुआ तो जरूरी नहीं कि शराब भी गायब हो जाए।
कहीं ऐसा न हो कि सरकारी दुकान बंद हो और गली का ‘चलता-फिरता ठेका’ खुल जाए!
यही कारण है कि शराबबंदी लागू करने से पहले सरकार को मजबूत प्रवर्तन, सीमा निगरानी, अवैध शराब पर कार्रवाई और नशामुक्ति सेवाओं की तैयारी करनी होगी।
राजस्व का क्या होगा?
यह सवाल सबसे कठिन है।
शराब से मिलने वाला आबकारी राजस्व सरकार के लिए महत्वपूर्ण है। शराबबंदी लागू होने पर इस राजस्व की तत्काल भरपाई करनी होगी।
लेकिन दूसरी तरफ शराब के कारण होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं, दुर्घटनाओं, हिंसा, अपराध और उत्पादकता में कमी की सामाजिक-आर्थिक कीमत भी होती है।
इसलिए सिर्फ यह कहना कि “शराब से सरकार को पैसा मिलता है” अधूरा हिसाब है।
सवाल यह भी होना चाहिए—
शराब से सरकार को जितना मिलता है, समाज शराब के नुकसान पर उससे कितना ज्यादा खर्च करता है?
छत्तीसगढ़ के लिए रास्ता क्या हो?
पूरी तरह शराबबंदी और पूरी तरह खुली बिक्री—इन दोनों के बीच एक प्रभावी नीति बनाई जा सकती है।
पहला— शराब की दुकानों की संख्या और स्थानों की समीक्षा हो।
दूसरा— स्कूल, कॉलेज और संवेदनशील इलाकों के आसपास बिक्री पर कड़ा नियंत्रण हो।
तीसरा— नाबालिगों को शराब बिक्री रोकने के लिए सख्त डिजिटल निगरानी हो।
चौथा— शराब से मिलने वाले राजस्व का एक निश्चित हिस्सा नशामुक्ति और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च किया जाए।
पांचवां— हर जिले में पर्याप्त नशामुक्ति एवं परामर्श केंद्र मजबूत किए जाएं।
छठा— अवैध और जहरीली शराब बनाने वालों पर कठोर कार्रवाई हो।
सातवां— ग्राम सभाओं और महिला समूहों को स्थानीय शराब नियंत्रण में अधिक भूमिका दी जाए।
फैसला बोतल का नहीं, भविष्य का होना चाहिए
छत्तीसगढ़ में शराबबंदी होनी चाहिए या नहीं—इसका जवाब सिर्फ राजनीति या आबकारी विभाग की कमाई से तय नहीं होना चाहिए।
अगर शराबबंदी लागू होती है तो उसकी तैयारी भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। अवैध बाजार को रोकने, राजस्व की भरपाई करने और नशे के आदी लोगों के पुनर्वास की व्यवस्था पहले से तैयार करनी होगी।
और अगर पूर्ण शराबबंदी नहीं होती तो शराब की उपलब्धता, बिक्री, विज्ञापन, नशामुक्ति और सामाजिक नुकसान को नियंत्रित करने की नीति और सख्त करनी होगी।
क्योंकि असली लक्ष्य शराब की बोतल को बंद करना नहीं, शराब से बर्बाद हो रहे परिवारों को बचाना होना चाहिए।
सरकार के लिए शराब राजस्व हो सकती है, लेकिन किसी गरीब परिवार के लिए वही शराब रसोई का राशन, बच्चे की फीस या घर की जरूरतों का पैसा हो सकती है।
इसलिए छत्तीसगढ़ के सामने असली सवाल यह नहीं है कि—
“शराब बेचनी है या बंद करनी है?”
बल्कि सवाल यह है—
“सरकार को राजस्व चाहिए या ऐसा समाज, जहां कमाई का पैसा घर तक सुरक्षित पहुंचे?”
फैसला सरकार का होगा, लेकिन कीमत समाज चुकाएगा।
