रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में पेश बजट 2026 को लेकर सियासत गरमा गई है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंह देव ने तंज कसते हुए कहा कि यह बजट विकास का रोडमैप कम और “घोषणाओं का अम्बार” ज़्यादा लगता है। उनके मुताबिक “डबल इंजन” की रफ्तार ऐसी है कि गाड़ी आगे बढ़ने के बजाय रिवर्स गियर में दिखाई दे रही है।


सिंह देव ने कहा कि बजट में कुल बढ़ोतरी महज़ ₹7,000 करोड़ की है, लेकिन रोज़गार सृजन का कोई ठोस खाका नजर नहीं आता। इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर योजनाओं की लंबी सूची तो है, पर समय-सीमा और वित्तीय स्पष्टता गायब है। “कागज़ पर विकास एक्सप्रेस दौड़ रही है, ज़मीन पर स्टेशन ही नहीं बन पा रहे,”
उन्होंने चुटकी ली।
अधूरे वादे, लंबित परियोजनाएँ
पूर्व डिप्टी सीएम ने सवाल उठाया कि पिछले वित्तीय वर्ष में स्वीकृत कई काम अब तक शुरू नहीं हुए या अधूरे पड़े हैं। अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल का कार्य लंबित है, वहीं राजधानी के मेकाहारा अस्पताल में प्रस्तावित इंटीग्रेटेड हॉस्पिटल और कैंसर यूनिट भी प्रतीक्षा सूची में हैं।
“घोषणाओं की नींव मजबूत है, लेकिन ईंट-सीमेंट शायद रास्ते में ही अटक गया,” उन्होंने व्यंग्य किया।
वेतन अटका, विकास लटका
उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के संविदा कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला। ऐसे में बजट के बड़े-बड़े दावे ज़मीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। “जब वेतन की गाड़ी ही पटरी पर नहीं, तो विकास की बुलेट ट्रेन कैसे चलेगी?” — सिंह देव ने कटाक्ष किया।
राजस्व का ‘एकमात्र सहारा’?
राजस्व सृजन पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि सरकार के पास विकल्प कम पड़ गए हैं, इसलिए पावन पर्वों पर भी शराब दुकानों को खुला रखकर आमदनी जुटाई जा रही है। “जब खजाना खाली हो, तो त्योहार भी ‘रेवेन्यू मॉडल’ बन जाते हैं,” उन्होंने कहा।
योजनाएँ: नाम नए, सामर्थ्य पुरानी?
मनरेगा के संदर्भ में उन्होंने याद दिलाया कि पूर्व में बड़े आवंटन के बावजूद राज्य का व्यय सीमित रहा। अब नई योजनाओं के नाम पर भारी खर्च की उम्मीद जताई जा रही है, जबकि बजट की वास्तविक क्षमता पर सवाल खड़े हैं।
“नाम बदलने से तस्वीर नहीं बदलती; तस्वीर बदलने के लिए नीयत और निष्पादन चाहिए,” उन्होंने जोड़ा।
निष्कर्ष: विकास या विज्ञापन?
सिंह देव के अनुसार यह बजट ‘विकास का विज़न’ कम और ‘विज्ञापन का संस्करण’ ज़्यादा प्रतीत होता है। उनका कहना है कि यदि स्पष्ट रोडमैप, समयबद्ध क्रियान्वयन और पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन नहीं हुआ, तो ग्रामीण छत्तीसगढ़ में रोज़गार और आधारभूत ढांचे की रफ्तार और धीमी पड़ सकती है।
राज्य की राजनीति में बजट को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज है। अब देखना यह होगा कि सरकार इन सवालों का क्या जवाब देती है — और घोषणाओं का यह महाकुंभ कब ज़मीन पर वास्तविक काम में बदलता है।
