

छत्तीसगढ़ की धरती इस समय आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठी है। लगातार एक हफ्ते से बारिश की कमी ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खेतों में पानी न होने से मिट्टी सूखकर फटने लगी है, बीज अंकुरण और पौधों की बढ़वार पर खतरा मंडरा रहा है। यह स्थिति केवल खेती की रफ्तार को ही नहीं, बल्कि गांव की अर्थव्यवस्था और किसानों की मनःस्थिति को भी प्रभावित कर रही है।

धान की प्रमुख खेती वाले इस प्रदेश में बारिश का हर दिन मायने रखता है। जून-जुलाई की अच्छी बरसात के बाद अगर अगस्त में बादल रूठ जाएं तो फसल का जीवन संकट में पड़ सकता है। खेत में खड़ी फसल पानी की कमी से मुरझाने लगती है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट का खतरा बढ़ जाता है। कई किसानों ने कर्ज लेकर बोआई की है, अब वे आसमान की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रहे हैं।
ऐसी परिस्थितियों में मौसम विभाग की सटीक भविष्यवाणी और सरकार की त्वरित राहत योजना ही किसानों के लिए संबल बन सकती है। जल संरक्षण और सिंचाई के वैकल्पिक साधनों पर गंभीरता से काम करना अब समय की मांग है, ताकि एक-दो हफ्ते की बारिश की कमी भी फसल को बर्बाद न कर सके।
बारिश पर पूरी तरह निर्भर खेती के इस दौर में हमें यह मानना होगा कि मौसम अब पहले जैसा भरोसेमंद नहीं रहा। बदलते जलवायु के दौर में, समय रहते ठोस कदम न उठाए गए तो आने वाले सालों में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। किसानों की पीड़ा को समझना और उनके लिए स्थायी समाधान तैयार करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है—क्योंकि जब खेत हरे-भरे होंगे, तभी थालियों में अन्न भर पाएगा।

